17 साल बाद फिर बनेंगे रैबीज के टीके!
वर्ष 1997 में नैनीताल के पटवाडांगर स्थित जैव प्रौद्योगिकी संस्थान में बना था रैबीज का आखिरी टीका
प्रौद्योगिकी संस्थान ने हैदराबाद की कंपनी से सैद्धांतिक अनुबंध किया
नीरज कुमार जोशी , नैनीताल । यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो इस वर्ष से नैनीताल के निकटवर्ती पटवाडांगर स्थित जैव प्रौद्योगिक संस्थान में 17 साल बाद फिर से रैबीज की वैक्सीन बनेंगी। संस्थान ने यहां टिश्यू कल्चर तकनीक से वैक्सीन उत्पादन के लिए हैदराबाद की विवीमेड लैब कंपनी से पीपीपी मोड के तहत सैद्धांतिक अनुबंध किया है। पटवाडांगर स्थित जैव प्रौद्योगिक संस्थान वर्ष 1903 में निर्मित ब्रिटिशकालीन भवन में स्थापित किया गया था। पूर्व में यह रैबीज, डिपथीरिया और टिटेनेस के टीके बनाने के लिए संयुक्त उत्तर प्रदेश का एकमात्र संस्थान था। यहां से निर्मित वैक्सीन पूरे उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में सस्ती दरों में उपलब्ध कराई जाती थी। 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के नियमों में बदलाव आने के बाद यहां भेड़ों के मस्तिष्क में उपस्थित कोशिकाओं से वैक्सीन बनाने पर रोक लगा दी गई। आखिरी बार यहां 1997 में टीका बनाया गया था। वैक्सीन उत्पादन का कार्य बंद होने से वर्ष 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने इसे पंतनगर विविद्यालय के अधीन कर दिया। संस्थान के निदेशक डा. महेश कुमार ने बताया कि हैदराबाद स्थित विवीमेड लैब कंपनी से संस्थान ने पीपीपी मोड के तहत वैक्सीन यूनिट पुन: लगाने की तैयारी की है। संस्थान द्वारा इस आशय का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा गया है। करीब 16 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट का खर्चा कंपनी स्वयं उठाएगी। इसकी बिक्री से होने वाले लाभ का एक हिस्सा संस्थान को दिया जाएगा। प्रदेश सरकार से हरी झंडी मिलने के बाद यहां रैबीज के टीके का निर्माण टिश्यू कल्चर विधि से किया जाएगा। उम्मीद है कि पटवाडांगर में पुन: रैबीज के टीके बनने से प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में टीके की उपलब्धता आसानी से हो सकेगी।
क्या है रैबीज वायरस
नैनीताल। रैबीज का वायरस दुनिया के खतरनाक वायरसों में से एक है। रैबीज का वायरस मानव मस्तिष्क के नर्वस तंत्र पर सीधे आक्रमण करता है। कुत्ते के काटने पर टीका लगाकर इसवे बचाव किया जा सकता है। रैबीजग्रस्त व्यक्ति का कोई इलाज नहीं है, उसकी जल्द मौत हो जाती है।

Comments
Post a Comment