नैनीताल के इतिहासविद् प्रो0 अजय सिंह रावत सम्मानित
नैनीताल- महावीर वर्धमान मुक्त विश्वविद्यालय कोटा, राजस्थान व राजस्थान के प्रमुख शिक्षाविद् और इतिहासविद् डा0 एम0एल0 शर्मा स्मृति न्यास द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित विशेष व्याख्यान के दौरान नैनीताल के इतिहासविद् प्रो0 अजय सिंह रावत को सम्मानित किया गया। इतिहास और पर्यावरण संरक्षण के प्रति विशेष योगदान और वानिकी इतिहास में महत्वपूर्ण शोध कार्य के लिए उनको विगत दिवस स्मृति चिन्ह और शाॅल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।
प्रो0 रावत ने अपने व्याख्यान के दौरान कहा कि भारत में वनों का प्रबन्धन प्राचीन भारत से चला आ रहा है और वैदिक कालीन प्रबन्धन से शिक्षा लेकर वर्तमान वनों का प्रबंधन बेहतर ढंग से किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाना चाहिए न कि शोषण जिस प्रकार गाय को दोहा जाता है उसी प्रकार प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाना चाहिए। प्राचीन भारत में भी यही व्यवस्था थी लेकिन अब दोहन के बजाय शोषण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कोटिल्य के अर्थशास्त्र में वनों का विभाजन हाथियों की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। भारत में अभ्यारणों का प्रारम्भ सम्राट अशोक द्वारा प्रारम्भ किया गया था। ग्रीक इतिहासकार थीओफ्रेटस मौर्यकालीन वानिकी प्रबंधन से अत्यधिक प्रभावित था। मध्यकालीन भारत में हालांकि मुगल शासकों को पशु-पक्षियों का अत्यधिक ज्ञान था लेकिन मुगल काल में अत्यधिक शिकार किया गया। तुजुके जहांगिरी से ज्ञात होता है कि अकबर के शासनकाल में ही तीन-चार हजार जानवरों का शिकार किया गया। जहांगीर के 1 वर्ष के शासनकाल में ही 276 जानवरों का शिकार किया गया और यही परम्परा ब्रिटिश शासन काल में ही चलती रही। सन् 1879 मंें भारत में 1546 शेरों का शिकार अंग्रेजों द्वारा किया गया।
इस अवसर पर महावीर वर्धमान मुक्त विश्वविद्यालय कोटा, राजस्थान के कुलपति प्रो0 विनय पाठक, प्रो0 कमलेश शर्मा, डा0 वराडिया सहित आदि उपस्थिति थे।
नैनीताल- महावीर वर्धमान मुक्त विश्वविद्यालय कोटा, राजस्थान व राजस्थान के प्रमुख शिक्षाविद् और इतिहासविद् डा0 एम0एल0 शर्मा स्मृति न्यास द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित विशेष व्याख्यान के दौरान नैनीताल के इतिहासविद् प्रो0 अजय सिंह रावत को सम्मानित किया गया। इतिहास और पर्यावरण संरक्षण के प्रति विशेष योगदान और वानिकी इतिहास में महत्वपूर्ण शोध कार्य के लिए उनको विगत दिवस स्मृति चिन्ह और शाॅल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।
प्रो0 रावत ने अपने व्याख्यान के दौरान कहा कि भारत में वनों का प्रबन्धन प्राचीन भारत से चला आ रहा है और वैदिक कालीन प्रबन्धन से शिक्षा लेकर वर्तमान वनों का प्रबंधन बेहतर ढंग से किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाना चाहिए न कि शोषण जिस प्रकार गाय को दोहा जाता है उसी प्रकार प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाना चाहिए। प्राचीन भारत में भी यही व्यवस्था थी लेकिन अब दोहन के बजाय शोषण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कोटिल्य के अर्थशास्त्र में वनों का विभाजन हाथियों की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। भारत में अभ्यारणों का प्रारम्भ सम्राट अशोक द्वारा प्रारम्भ किया गया था। ग्रीक इतिहासकार थीओफ्रेटस मौर्यकालीन वानिकी प्रबंधन से अत्यधिक प्रभावित था। मध्यकालीन भारत में हालांकि मुगल शासकों को पशु-पक्षियों का अत्यधिक ज्ञान था लेकिन मुगल काल में अत्यधिक शिकार किया गया। तुजुके जहांगिरी से ज्ञात होता है कि अकबर के शासनकाल में ही तीन-चार हजार जानवरों का शिकार किया गया। जहांगीर के 1 वर्ष के शासनकाल में ही 276 जानवरों का शिकार किया गया और यही परम्परा ब्रिटिश शासन काल में ही चलती रही। सन् 1879 मंें भारत में 1546 शेरों का शिकार अंग्रेजों द्वारा किया गया।
इस अवसर पर महावीर वर्धमान मुक्त विश्वविद्यालय कोटा, राजस्थान के कुलपति प्रो0 विनय पाठक, प्रो0 कमलेश शर्मा, डा0 वराडिया सहित आदि उपस्थिति थे।

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