चीड़ के पेड़ पर अटकी रहीं 45 लोगों की सांसें
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नैनीताल (एसएनबी)। चीड़ का एक अदद पेड़, पेड़ पर अटकी बस और बस में सवार 45 लोग। इन लोगों की सांसें अटक गई। पलभर आंखों के आगे मौत दिखाई दी। मगर किस्मत रही कि बस पेड़ से अटकी रही और यात्री एक-एक कर उससे बाहर निकल गये। यह नजारा रविवार दोपहर को भेड़िया पखांड़ के निकट का था। यदि बस चीड़ के पेड़ पर न अटकती तो सीधे लगभग 250 मीटर गहरी खाई में गिर जाती। ऐसे में यात्रियों का बचना लगभग नामुमकिन था। इस हादसे में 11 लोग घायल हो गये। घटना रविवार दोपहर साढ़े तीन बजे की है। उत्तराखंड परिवहन निगम की बस नैनीताल से हल्द्वानी की ओर जा रही थी। बस में ड्राइवर-कंडक्टर समेत 45 लोग सवार थे। बस जब दोगांव से आगे भेड़िया पखांड़ के निकट पहुंची तो सामने से एक डंपर आ गया। डंपर तेज रफ्तार में था। बस चालक ने बचने का प्रयास किया। इस कारण बस अनियंत्रित हो गयी और खाई की ओर जाने लगी। सड़क किनारे एक चीड़ का पेड़ था। बस पलटने के बावजूद पेड़ से अटक गई। यदि पेड़ नहीं होता तो बस सीधी खड़ी चट्टान से गिरती हुई नीचे बहते नलैना नाले में पहुंचती और यात्रियों ही नहीं बस के परखच्चे उड़ जाते। दुर्घटना में 11 यात्री मामूली रूप से घायल हुए हैं, जबकि चालक ही बेहोश हो गया। अन्य लोग बच गए। परिचालक संतोष जीना के अनुसार चालक आरसी बेलवाल ने सामने से खतरनाक गति से आ रहे डम्पर को बचाने का प्रयास किया। इस कोशिश में बस के ब्रेक फेल हो गये। यात्रियों को प्राथमिक उपचार के बाद घर भेज दिया गया।
बड़ा हादसा होने से टला, 11 लोग घायल
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17 साल बाद फिर बनेंगे रैबीज के टीके! वर्ष 1997 में नैनीताल के पटवाडांगर स्थित जैव प्रौद्योगिकी संस्थान में बना था रैबीज का आखिरी टीका प्रौद्योगिकी संस्थान ने हैदराबाद की कंपनी से सैद्धांतिक अनुबंध किया नीरज कुमार जोशी , नैनीताल । यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो इस वर्ष से नैनीताल के निकटवर्ती पटवाडांगर स्थित जैव प्रौद्योगिक संस्थान में 17 साल बाद फिर से रैबीज की वैक्सीन बनेंगी। संस्थान ने यहां टिश्यू कल्चर तकनीक से वैक्सीन उत्पादन के लिए हैदराबाद की विवीमेड लैब कंपनी से पीपीपी मोड के तहत सैद्धांतिक अनुबंध किया है। पटवाडांगर स्थित जैव प्रौद्योगिक संस्थान वर्ष 1903 में निर्मित ब्रिटिशकालीन भवन में स्थापित किया गया था। पूर्व में यह रैबीज, डिपथीरिया और टिटेनेस के टीके बनाने के लिए संयुक्त उत्तर प्रदेश का एकमात्र संस्थान था। यहां से निर्मित वैक्सीन पूरे उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में सस्ती दरों में उपलब्ध कराई जाती थी। 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के नियमों में बदलाव आने के बाद यहां भेड़ों के मस्तिष्क में उपस्थित कोशिकाओं से वैक्सीन बनाने पर रोक लगा द...
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