सलमान करेंगे विवाह!
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रोमानिया की लुलिया वान्तुर को बना सकते हैं जीवनसाथी
नई दिल्ली। सुपरस्टार सलमान खान ने इस साल के अंत तक विवाह के बंधन में बंधने का संकेत दिया है क्योंकि वह अब अकेले रहते-रहते ऊब चुके हैं। श
निवार शाम ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2014’ में 48 वर्षीय ‘जय हो’ स्टार ने इस बात से इनकार नहीं किया कि वह रोमानियाई सुंदरी लुलिया वान्तुर के साथ जीवन भर के बंधन में बंध सकते हैं। कथित रूप से सलमान पिछले कुछ समय से वान्तुर को डेट कर रहे हैं। सलमान ने कहा, अब मैं संक्र मण काल में हूं और मुझे अच्छा लग रहा है। 15 साल की उम्र से मुझे कभी बदलाव नहीं मिला। पहली बार मुझे ऐसा मौका मिला है और पिछले ढाई साल से मुझे बदलाव का खूब अवसर मिला है। अब बदलावों पर अटकलें लगानी बंद कर देनी चाहिए क्योंकि जल्दी ही मेरे जीवन में कुछ बदलने वाला है..। उन्होंने कहा, मैं मानवता को मानता हूं। मैं इस्लाम, ईसाई दोनों धर्मो को मानता हूं और जितना संभव हो सकते उतना ज्यादा सही काम करने का प्रयास करता हूं। मैं काफी भाग्यशाली रहा हूं। मेरे पिता पठान हैं, मां हिन्दू हैं और दूसरी मां ईसाई। मेरे बहनोई पंजाबी हैं और पत्नी को बाहर से लाने की सोच रहा हूं। सलमान का नाम अक्सर उनकी सह-कलाकारों के साथ जुड़ता रहा है और उन्हें बहुत ज्यादा नियंतण्ररखने वाले प्रेमी के रूप में जाना जाता है। सलमान खुद भी मानते हैं कि वह बहुत खराब प्रेमी रहे हैं। उनका कहना है, जब आप किसी रिश्ते में होते हैं तो यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि वह आपको छोड़कर ना जाए और इसके लिए आप कुछ भी करते हैं। (एजेंसी)
मेरे पिता पठान हैं, मां हिन्दू हैं और दूसरी मां ईसाई। मेरे बहनोई पंजाबी हैं और पत्नी को बाहर से लाने की सोच रहा हूं : सलमान ‘
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17 साल बाद फिर बनेंगे रैबीज के टीके! वर्ष 1997 में नैनीताल के पटवाडांगर स्थित जैव प्रौद्योगिकी संस्थान में बना था रैबीज का आखिरी टीका प्रौद्योगिकी संस्थान ने हैदराबाद की कंपनी से सैद्धांतिक अनुबंध किया नीरज कुमार जोशी , नैनीताल । यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो इस वर्ष से नैनीताल के निकटवर्ती पटवाडांगर स्थित जैव प्रौद्योगिक संस्थान में 17 साल बाद फिर से रैबीज की वैक्सीन बनेंगी। संस्थान ने यहां टिश्यू कल्चर तकनीक से वैक्सीन उत्पादन के लिए हैदराबाद की विवीमेड लैब कंपनी से पीपीपी मोड के तहत सैद्धांतिक अनुबंध किया है। पटवाडांगर स्थित जैव प्रौद्योगिक संस्थान वर्ष 1903 में निर्मित ब्रिटिशकालीन भवन में स्थापित किया गया था। पूर्व में यह रैबीज, डिपथीरिया और टिटेनेस के टीके बनाने के लिए संयुक्त उत्तर प्रदेश का एकमात्र संस्थान था। यहां से निर्मित वैक्सीन पूरे उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में सस्ती दरों में उपलब्ध कराई जाती थी। 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के नियमों में बदलाव आने के बाद यहां भेड़ों के मस्तिष्क में उपस्थित कोशिकाओं से वैक्सीन बनाने पर रोक लगा द...
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